क्या लिखूं

 

कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं,या दिल का सारा प्यार लिखूं.
कुछ अपनो के जज़्बात लिखूं या सपनो की सौगात लिखूं.

मैं खिलता सूरज आज लिखूं या चेहरा चाँद गुलाब लिखूं.
वो डूबते सूरज को देखूं या उगते फूल की साँस लिखूं.

वो पल मैं बीते साल लिखूं या सदियों लंबी रात लिखूं.
मैं तुमको अपने पास लिखूं या दूरी का अहसास लिखूं.

मैं अंधे के दिन मैं झाकूँ या आँखों की मैं रात लिखूं.
मीरा की पायल को सुन लून या गौतम की मुस्कान लिखूं.

बचपन मैं बच्चों से खेलूँ या जीवन की ढलती शाम लिखूं.
सागर सा गेहरा हो जौन या अंबार का विस्तार लिखूं.

वो पहेली पहेली प्यास लिखूं या निस्छल पहेला प्यार लिखूं.
सावन की बारिश मैं भीगूं या आँखों की मैं बरसात लिखूं.

गीता का अर्जुन हो जौन या लंका रावण राम लिखूं.
मैं हिंदू मस्लिन हो जाउ या बेबस सा इंसान लिखूं.

मैं एक ही मज़हब को जी लून या मज़हब की आँखें चार लिखूं.
कुछ जीत लिखूं या हार लिखूं,या दिल का सारा प्यार लिखूं.

एक लड़की मुझे सताती है’ .................

अंधेरी-सी रात में एक खिड़की डगमगाती है,
सच बताऊँ यारों तो,

एक लड़की मुझे सताती है।
भोली भाली सूरत उसकी मखमली-सी पलकें है,
हल्की इस रोशनी में,

मुझे देख शर्माती है!
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है,
बिखरी-बिखरी ज़ुल्फ़ें उसकी
शायद घटा बुलाती है,

उसके आँखों के काजल से बारिश भी हो जाती है,
दूर खड़ी वो खिड़की पर मुझे देख मुसकुराती है।
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है,
उसकी पायल की छम-छम से

एक मदहोशी-सी छा जाती है
ज्यों की आंख बंद करूँ मैं तो सामने वो जाती है,
सच बताऊँ यारों तो इक लड़की मुझे सताती है!
अंधेरी-सी रात में एक खिड़की डगमगाती है,
ज्यों ही आँख खोलता हूँ
मैं तो ख़्वाब वो बन जाती है
रोज़ रात को इसी तरह
इक लड़की मुझे सताती है।

अश्क़ नहीं वो ख़्वाब है आँखों में
महका हुआ कोई गुलाब है आँखों में

ज़र्रा-ज़र्रा नूर की बारिश है
एक क़तरा माहताब है आँखों में

प्यार के फलसफे, प्यार की बातें
प्यार की खुली किताब है आँखों में

रूह हो जैसे प्यास की एक शमाँ
प्यासी-प्यासी-सी आब है आँखों में

लम्हा-लम्हा मासूमियत है, खामुशी है
गो लरजाँ एक सैलाब है आँखों में

उठ के झुकना, झुक के फिर उठना
हर एक अदा लाज़वाब है आँखों में

तुम आए, दिलजोई हुई
मुस्कुरा पड़ी आँख रोई हुई

महक उठीं कलियाँ जज्बात की
शबनमे-अश्क़ से धोई हुई

मचल-मचल गईं आज
हसरतें दिल की सोई हुई

शमए-आरजू थी दिल में
बुझी-बुझी, खोई हुई

सोचते रहे ता-उम्रे-फ़िराक़
खता कब हमसे कोई हुई

रो-रोकर तुम्हारी याद में
अफ़साने हुए, गज़लगोई हुई

वफ़ा मिली ना प्यार मिला ज़िंदगी में
मिला भी तो क्या मिला ज़िंदगी में

न दोस्त, न हमदम, न हमनवा कोई
करें तो किससे करें गिला ज़िंदगी में

दर्द के फूल, दर्द की कलियाँ
दर्द का ही बाग़ खिला ज़िंदगी में

बहुत-बहुत तो मिला नहीं थोड़ा भी
थोड़ा-थोड़ा ही बहुत मिला ज़िंदगी में

दर्द भरे गीत गुनगुनाता हूँ मैं
मेरी आदत है, दर्द में चैन पाता हूँ मैं

कभी तन्हाई ने गले लगाया था मुझको
अब तन्हाई को गले लगाता हूँ मैं

अजीब हालत है- दिल की ही सुनता हूँ
दिल को ही अपनी बात सुनाता हूँ मैं

सुना था- किसी के रोने पर हँसती है दुनिया
लो अब रोकर दुनिया को हँसाता हूँ मैं

बड़ी वफ़ा से निभा रहे थे तुम, थोड़ी-सी बेवफाई कर दी
क्या आलम था तेरे उन्स का, और तुम्हीं ने जगहंसाई कर दी

दश्ते-फ़िराक़ में छोड़ कर तन्हा, तुम न जाने कहाँ गुम हुए
वाह मेरे रहनुमा! क्या खूब तुमने मेरी रहनुमाई कर दी

मुजस्सिम हँसी बनकर आये थे मेरी जिंदगी में कभी, मगर
तुम गए तो इस तरह गए, आँखों को नज़्र रुलाई कर दी

ग़म ही शमाँ, ग़म ही रोशनी, ग़म ही परछाईं मेरी
अपने बदले तुमने ग़म से ही मेरी आशनाई कर दी

जब तेरी नज़रों का नूर था, मैं कितना मगरूर था
अब लगता है दो दिन का बस वो तो एक सुरूर था

दरअस्ल एक सपना था, पलकों से फिसल गया
आँख खुली तो पाया- मैं तुमसे बहुत, बहुत दूर था

दर्द की जागीर से जाने कब एक क़तरा निकल गया
अश्कों को सम्हाल रखूँ, इतना भी ना शऊर था

तुम्ही कहो- क्या ख़ाक पूरा होता अरमाँ उसका
एक बौने को जो चाँद छूने का फ़ितूर था !!!

लेकर हाथों में वो आईना पूछते हैं
मुझसे मेरी ज़िंदगी का मायना पूछते हैं

रोशनी अपने हिस्से की उन्हें दे चुका
फिर भी किसे कहते हैं चाहना- पूछते हैं

इस मासूमियत को आखिर क्या कहिए
क्यूँ भूल गया हूँ मैं हँसना, पूछते हैं

जिन लबों ने कभी आने को कहा नहीं
उन्ही लबों से, तुम आए क्यूँ ना- पूछते हैं

यूँ के जैसे मुझे पहचानते ही नहीं
कब से हो तुम मेरे आशना पूछते हैं

उफ्फ़! ये अदा, ये शोखी, ये अना
क्या है तेरी ज़िंदगी मेरे बिना, पूछते हैं

प्यास का समन्दर है के समन्दर की प्यास है
एक दिल है मेरा और वो भी उदास है

मुद्दत से एक क़तरा खुशबू आँखों में है
एक दर्द-सा कहीं दिल के आस-पास है

अपने ही लहू से तर कोई गुलाब हो जैसे
तमन्ना के खूँ से तर दिल का लिबास है

बतौर इल्ज़ाम ही सही मगर सच कहते हैं लोग
इक अहसास के सिवा और क्या इस दिल के पास है

अज़ीब दिल है, दर्दे-दिल को ढूँढता है
कोई मक़तूल अपने क़ातिल को ढूँढता है


सरे-शाम से चरागे-चश्मे-नम लिए
एक मुसाफिर अपनी मंजिल को ढूँढता है

कभी अपने खाली हाथ देखता है तो कभी
गुज़श्ता उम्र के हासिल को ढूँढता है

उठकर चला तो आया अपनी रौ में मगर
रह-रहकर तेरी ही महफ़िल को ढूँढता है

दरिया के एक किनारे खड़ा है और
दरिया के दूसरे साहिल को ढूँढता है

इस दश्त में हर दरख्त तन्हा-तन्हा-सा
अबकी बहार में अनादिल को ढूँढता है

बहुत रोयेंगे हम तुम्हें याद करके
देखेंगे हर चेहरे में तेरा चेहरा ईजाद करके

और करेंगे भी क्या तेरे बगैर हम
बैठे रहेंगे मुद्दतों दिल नाशाद करके

वक्ते-बेरहम से किया करेंगे सवाल
क्या मिला उसे यूँ हमें बरबाद करके

जीस्ते-नाशाद को बहलाएँगे तो कैसे
मिलेगा भी क्या किसी से फरियाद करके

चाहा था साथ तुम्हारे मुस्कुराना, मगर
अश्क पाया हमने तुम पर एतमाद करके

तेरी क़ुर्बत के सिवा और किसी शै में
असर कहाँ, कि जाए हमें शाद करके

चले जा रहे हो और ही जहाँ में तुम
ग़मे-फिराक सीने पर हमारे लाद करके

और हमारी जिंदगी में अब बचा ही क्या
बस एक बारे-ग़मे-जिंदगी को बाद करके

रोशन है मेरी रात कि मेरे पास तुम हो
मुझे चरागों से क्या, कि मेरे पास तुम हो

अब अँधेरे का डर किसे है, चाहे तो
हर चराग़ बुझा दे हवा, कि मेरे पास तुम हो

ग़म नहीं, गो ज़माने से मिला नहीं
और कुछ ग़म के सिवा, कि मेरे पास तुम हो

क्यों शोर मचाती है दुनिया, ले जाए
जो उसने है दिया, कि मेरे पास तुम हो

कल की परवा क्यों करें, अब है यकीं
दर्द को बना लेंगे दवा, कि मेरे पास तुम हो

मुबारक हो उस जहाँ को ये खुदाई, अब यहाँ
कौन खुदा, कैसा खुदा? कि मेरे पास तुम हो

जिसे चाहा था, उसका साथ न मिला
मेरी तरफ बढ़े प्यार से, वो हाथ न मिला

मैंने तलाशा तो हसीं बुत कई मिल गए
मेरे दर्द को अपना कहे, वो जज्बात न मिला

हसरतों को हासिल नहीं कुछ अश्कों के सिवा
तमन्ना ढूँढकर हारी, हँसी का सुराग न मिला

दिल का आलम हो कि खिजाँ का मौसम
उड़ते परिंदों को सब्ज कोई शाख न मिला

जब भी दिल उदास होता है, तेरे पास चला आता हूँ मैं
बहाने से छूकर तेरा हाथ, अपना ही दर्द सहलाता हूँ मैं

बस एक तुम होते हो साथ मेरे, तो तन्हाई साथ नहीं होती
यूँ भीड़ में खुद को कुछ ज्यादा ही तन्हा पाता हूँ मैं

तुम्हारे रंजो-ग़म पर कुछ तो आखिर हक हो मेरा
कि अपने दिल को तेरे दर्द का लिबास पहनाता हूँ मैं

दोस्त, अपने अह्सासे-दर्द से मुझे महरूम न कर
ये वही दर्द है जिससे अपना दिल बहलाता हूँ मैं

कई बार यूँ भी होता है कि दिल में
आरजू1 की लौ कोई जगमगाती है,
दर्द से बोझिल पलकों से मगर
अश्क़2 गिरते हैं, शमाँ बुझ जाती है

बुझी-बुझी सी जिंदगी,
सुलग कर रह जाती है...!

दिल की रविश3 पर बस खार4 ही खार
तमन्ना दूर खड़ी सोच में पड़ जाती है,
क़दम वापस खींच लेती हैं खुशियाँ
उझक कर हसरतें5 भी लौट जाती है

झिझकी हुई सी जिंदगी,
ठिठक कर रह जाती है...!

दर्द की गिरफ्त में तन्हाईयों6 से घिरी
जिंदगी खुद को बेबस-सी पाती है,
बन्द दरीचे7 पर दस्तक देती है मुहब्बत
टीस दिल के टुकड़े कर जाती है

टूटे काँच सी जिंदगी,
दरक कर रह जाती है...!

बुझी-बुझी सी जिंदगी,
सुलग कर रह जाती है...!

वफ़ा की वफात1 पर
इस हजीं2 वारदात3 पर
आ, कि जरा देर रो लें हम

कल को आँखें तरस ना जाएँ
बूँदें शायद फ़िर बरस ना पायें
अश्कों की बारिश में दिल को
क्यों न आज भिंगों लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम

स्याही4 चेहरे पर दर्द की
कई दिन से है बिखरी हुई
चलो जतन कोई करें मिलकर
ये रंग चेहरे का धो लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम

बेकसी5 है, तरावट6 नहीं
किसी के आने की आहट नहीं
इस उदासी को, इस खामोशी को
रूह7 की पहनाई8 में समो लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम


रूह भी, जिस्म9 भी
थक गया साँसों का तिलिस्म10 भी
मसरूफियों11 को कर दें दरकिनार12
मिलकर गले चार पल सो लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम

सारे अरमाँ ख़ाक13 हो चले
हम फिर से खाली हाथ हो चले
चंद कलियाँ निशात14 की चुराएँ
ख्वाब थोड़े-से फिर संजो लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम

कुछ ज़ख्म तेरे भी
कुछ ज़ख्म हैं पास मेरे भी
ज़ख्म दोनों के दूर-दूर क्यों रहें
दर्द है एक जैसा, साथ पिरो लें हम
आ, कि जरा देर रो लें हम

इस गमे-हयात15 पर
दिल और दर्द के ताल्लुकात16 पर
आ, कि जरा देर रो लें हम

रंग गया, नूर1 गया, जिंदगी की रानाईयाँ2 गईं
आँखों से दूर कहीं ख़्वाबों की परछाईयाँ गईं

उड़ती फिरती थीं बागे-हयात3 में गुनगुनाती हुई
कितनी शोख4 थीं वो मशर्रत5 की तितलियाँ, गईं!

पहले से ही क्या कम थे जो मेरी राहों में
बिछा के काँटे कुछ और, तुम्हारी नजदीकियाँ6 गईं

मैं तो अपने दिल को कुछ समझा भी ना सका
शायद तुम्हें पता हो, पूछूँ, कहाँ मेरी खुशियाँ गईं?

तुम्हें देखा तो भरी आँख भी मुस्करा गई
मेरे होंठों की हँसी हर ज़ख्म1 छुपा गई

मुद्दत2 बाद गुज़रे हो इस गली से तन्हा3
सोचता हूँ, बात क्या तुम्हें याद इधर की दिला गई?

एक मैं ही तो नहीं था तुम्हारे अपनों में कभी
बड़ी लम्बी क़तार4 थी, क्या ख़त्म होने को आ गई?

ख्वाहिश5 तो बहुत थी साथ तुम्हारे रहने की
पर क्या करें? आड़े तुम्हारे ही मजबूरियाँ आ गई

तुम से दूर होकर सिवा तड़प के कुछ हासिल तो नहीं
पर ये बोझ भी चुपके से हर साँस उठा गई

खैर यही सही, तुम खुश तो हो अपनों में
एक मेरी कमी क्या लेके तुम्हारा गई?

ये धरती वही रहेगी, आसमाँ वही रहेगा
मगर ऐ दोस्त, अपना निशाँ1 नहीं रहेगा


कुछ दूर तक चलकर गुम हो जायेंगे नक्शे-पा2
जिंदगी का सिलसिला यूँ ही रवाँ3 नहीं रहेगा


अधूरे अरमाँ4 कुछ, कुछ राजे-दिल5 जाहिरो-निहाँ6
वक्ते-रुखसत7 साथ कुछ और सामाँ नहीं रहेगा


रोशन राहों पर मचलकर उठेंगे शोख8 क़दम कई
उनकी मंजिल मगर अपना आशियाँ9 नहीं रहेगा


पुकार लिया करेंगी हमें खामोशियाँ कुछ लबों की
हर दिल में तो हमारी याद का कारवाँ10 नहीं रहेगा

वो आँखें-
सपनीली सी,
जिनमें
रक्स1 करती थीं
ख़्वाबों की कुछ
परछाईयाँ-
नीली सी.
वो आँखें-
कुछ गीली-सी,
कुछ सपनीली-सी.


वो आँखें-
कि पंछी ने उड़ने को
अभी-अभी खोली हों जैसे-
नर्म-सी पाँखें;
वो आँखें-
जिनमें दूर तक उतरकर
जी करता था-
झाँकें;
वो आँखें...


वो आँखें-
जो मासूम-सी हँसी
बिखराती थीं,
किसी की राह में
बिछ जाने का
ख़्वाब सजाती थीं;
हँसती थीं- मुस्कराती थीं,
सजती-संवरती और इठलाती थीं,
वो आँखें-
जो नूर2 छलकाती थीं;
जाने किन अंधेरों में
खो गईं-
वो आँखें,
दूर सबसे
हो गईं-
वो आँखें.


अभी उम्र ही क्या थी
उन आँखों की,
अलविदा कह गईं;
जाने कैसी थीं-
वो आँखें,
जो हर दर्द-
चुपचाप सह गईं.


उन आँखों के
हर ख़्वाब-
अधूरे रह गए,
वक़्त की दरिया3 में
न जाने-
किधर बह गए.


मासूम,
कँवल4 की कली-
वो आँखें;
क्यों रह गईं
अधखिली-
वो आँखें?

मिले नहीं हो तुम तो तड़प तहरीर1 बन जाती है
वजा-ए-दिले-गमगीं2 भी रोशनी की लकीर बन जाती है


शामे-ग़मे-हिज्राँ3 तुमको ही ढूँढती हैं निगाहें4
और एक वो वक़्त कि हर शै5 तेरी ही तस्वीर बन जाती है


उठती है जो निदा6 रूह7 से तड़प कर तेरे लिए
फज़ा8 में खोकर तयूर9 की वो सफीर10 बन जाती है


तेरे दर11 के सिम्त12 मायल13 हो भी जाता हूँ तो
तेरी वो सुकूते-जुबाँ14 मेरे क़दमों की जंजीर बन जाती है


गर नज़र आ जाओ तुम कभी रहगुज़र15 में
उठती है जो तेरी तरफ, वो हर इक निगाह शरीर16 बन जाती है


ये गुंचा17, ये शाखे-गुल18, ये मौजे-दरिया19, ये चाँदनी
तुझे देखकर देखूँ जिसे, वो हर इक शै बेनज़ीर20 बन जाती है

देखूँ तुझे तो भी तड़पता हूँ, न देखूँ तुझे तो भी
तिशनगी21 ये दिल की कैसी अनबूझ पीर22 बन जाती है

खनकती है हर वक़्त तेरे ही ख़यालों की बेडियाँ

तुम्हें देखा है मैंने कई बार,
शाम को, तुलसी के चबूतरे पर
दीये जलाते हुए,
पूजा की थाल सजा
शंख बजाते हुए,
और न जाने कितनी बार,
अपने बगीचे में
एक फूल-सा लहराते हुए.
हर शाम एक नयी अदा से,
देखा है तुम्हें मुस्काते हुए.


न जाने किसे देखकर,
तुम्हारे होंठों पर
खिल जाती है हँसी,
तेरे चेहरे को चूमकर
मचलती है लट शबनमी
और थम जाते हैं पाँव राहगीर के,
तुम्हें देखकर गाते हुए.


जाने क्या बात है कि
चलती हो जब तुम राहों में,
एक सुरूर1-सा छा जाता है
हर किसी की निगाहों में
और मजा आता है तुम्हें भी शायद
हर किसी को तड़पाते हुए.


तुम्हारे होंठों की जुम्बिश से,
अपने नाम का
हर किसी को गुमाँ होता है,
पर जलती है जो आग मेरे सीने में,
जरा भी नहीं धुआँ होता है.



तुमने देखा होगा नहीं, मुझे कभी
अपनी गलियों के फेरे लगाते हुए,
मुझे देखकर भी कभी,
तुमने महसूस की होगी नहीं, कशिश3 कोई
क्योंकि मेरा चेहरा, तुमसा नहीं
और झिझकता हूँ मैं,
तुम्हें अपनी मंशा4 बताते हुए.
मन की आँखों से,
क्या तुम कभी देख पाओगी,
मुझे प्यार जताते हुए???

चुभ सकते हैं
काँटे भी दामन में मगर

काँटों की
परवाह किसे है?

एक फूल जो
आ गया है नज़र हमें
तड़पते हैं
दिन-रात उसी के लिए...!

तुम बेबस थी, रो तो लेती थी,
हम तो ना हंस पाए, ना रो पाए....

जब तक मकां था, साथ रहें...
जहाँ छत गयी, छोड़ आये

अब बेवफा ना कहना, तुझे खुश रखना था,
तेरी हर पल हसी के लिए, तुम से भी मुँह मोड़ आये...

प्यार मे साथ जीना, मायने रखता है?
इक-दूजे के लिए जीना, शायद इतना ही पढ़ पाए।

जुदाई मे गम नही होता, यादें मुस्कुरा देती हैं,
हरदम मुस्कुराने को हमदम, तुझे छोड़ना था, छोड़ आये।

मिलूंगा फिर तुझे, शायद आजमाता हूँ,
मोहब्बत ये हमारी, देखें कोई तोड़ ना जाये।

क्यो खुद को तन्हा समझती हो....
तेरी हर पुकार पर, हम पास खडे मिलेंगे....

साथ जिंदगी भर देंगे, हमसफ़र समझ लेना...
तुम गुजरों कितनी ही बार, हम सड़क है, यही पड़े मिलेंगे...

फिर भी गर तुम रोती हो, तन्हा खुद को समझती हो,
खुद मे झाँक कर देख लेना, तेरी हर सांस मे हम मिलेंगे...

कभी कुछ कहा नही जाता, कभी जुदा भी होना पड़ता है...
प्यार जब जवां हो जाये, तकरार करते हम मिलेंगे....

बस मुस्कुरा देना इक बार, ना रोना कभी तुम,
तेरी हर मुस्कान पर, कुर्बान हम मिलेंगे....

तुम सब कुछ हो मेरी, तुमसे ही तो मैं जिया हूँ,
किनारों की ना सोच, वो साथ तो चलेंगे, पर कभी ना मिलेंगे....

रेत के महल बनाने का शौक तो बहुत है हमें,
पर जहाँ महल बनाते हैं, लहर वहीं आती है

हमारी आशिक-मिजाजी दुनिया मी मशहूर होती,
पर स्वप्न-सुन्दरी हमारी, बस अच्छी दोस्त बन जाती है

बन-ठन कर आये थे, उनसे गुफ्तगू के लिए,
पर जिस दिन ना नहाया हो, वो कमबख्त उसी दिन ही आती है

दिल तो चाहता है, दिलबर हमारा भी हो,
पर उनकी फिक्र करना, हमारी बेफिक्री को सताती है,

वो दिन भी क्या थे, जब सुनते थे हम गज़लें भरपूर,
अब तो तनिक सी आवाज़ भी, कानों को चुभ जाती है

ऐ मालिक ऐसा भी हो, जो सोचता हूँ मैं कभी,
पर जरूरत पर तो, प्रार्थना भी तुझ तक नही जाती है

******************************************************

एतबार करके उन का, दह गए हम ,

दम-ब-दम कितने आलाम सह गए हम ।

*

वादा रफाकत का किया था शीरीं जुबां से,

ना दिया दीदार , अकेले रह गए हम ।

*

बेखुदी में था एक काम, राह उनकी ताकना

फकत उनकी इबादत में नह गए हम ।

*

नहीं लगता दिल कहीं, होश नहीं है हमें,

अब तो कहीं के भी नहीं रह गए हम ।

*

इरादा था उनकी पहलू में अश्क बहानेका

उनके बगैर , आंसुओं में बह गए हम ।

*****************

इस अजनबी दुनिया में,

अकेला एक ख्वाब हूँ,

सवालो से खफा,

छोटा सा एक जवाब हूँ,

जो न समझ सके,

उनके लिए '' कौन'',

जो समझ चुके,

उनके लिए एक खुली किताब हूँ .

 ******************

शिकायत है उन्हें कि,
हमें मोहब्बत करना नही आता,
शिकवा तो इस दिल को भी है,
पर इसे शिकायत करना नहीं आता.
*********************

----------------------
न रास्ता सुझाई देता है,
न मंजिल दिखाई देती है,
न लफ्ज़ जुबां पर आते हैं,
न धड़कन सुनाई देती है,
एक अजीब सी कैफियत ने
आन घेरा है मुझे,
की हर सूरत में,
तेरी सूरत दिखाई देती है...
------------------------

यादों की किम्मत वो क्या जाने,
जो ख़ुद यादों के मिटा दिए करते हैं,
यादों का मतलब तो उनसे पूछो जो,
यादों के सहारे जिया करते हैं...
--------------------------

खूबसूरत है वो लब जिन पर,
दूसरों के लिए कोई दुआ आ जाए,

खूबसूरत है वो मुस्कान जो,
दूसरों की खुशी देख कर खिल जाए,

खूबसूरत है वो दिल जो,
किसी के दुख मे शामिल हो जाए,

खूबसूरत है वो जज़बात जो,
दूसरो की भावनाओं को समज जाए,

खूबसूरत है वो एहसास जिस मे,
प्यार की मिठास हो जाए,

खूबसूरत है वो बातें जिनमे,
शामिल हों दोस्ती और

प्यार की किस्से, कहानियाँ,
खूबसूरत है वो आँखे जिनमे,

किसी के खूबसूरत ख्वाब समा जाए,
खूबसूरत है वो हाथ जो किसी के,

लिए मुश्किल के वक्त सहारा बन जाए,
खूबसूरत है वो सोच जिस मैं,

किसी कि सारी ख़ुशी झुप जाए,
खूबसूरत है वो दामन जो,

दुनिया से किसी के गमो को छुपा जाए,
खूबसूरत है वो किसी के,

आँखों के आसूँ जो
किसी के ग़म मे बह जाए..

तुम ज़िदगी ना सही
दोस्त बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम हसी ना सही
मुसकान बनकर तो ज़िदगी मे आओ।

तुम हकीकत ना सही
खयाल बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम नज़र ना सही
याद बनकर तो ज़िदगी मे आओ।

तुम दिल ना सही
धड़कन बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम गज़ल ना सही
सायरी बनकर तो ज़िदगी मे आओ।

तुम खुशिया ना सही
गम बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम पास ना सही
एहसस बनकर तो ज़िदगी मे आओ।

तुम कल ना सही
आज बनकर तो ज़िदगी मे आओ
तुम ज़िदगी ना सही
दोस्त बनकर तो ज़िदगी मे आओ...

*********************

आंख जब भी बंद किया करते हैं..
सामने आप हुआ करते हैं..

आप जैसा ही मुझे लगता है..
ख्वाब मे जिससे मिला करते हैं..

तू अगर छोडके जाता है तो क्या..
हादसे रोज़ हुआ करते हैं..

नाम उनका ना, कोई उनका पता..
लोग जो दिलमे रहा करते हैं..

हमने “राही” का चलन सीखा है..
हम अकेले ही चला करते हैं..

*********************

प्यार वो हम को,

बेपनाह कर गये,
फिर ज़िनदगीं में हम को,

तन्नहा कर गये,
चाहत थी उनके इश्क में,

फ़नाह होने की,
पर वो लौट कर आने को,

भी मना कर गये.....

मुस्कुराते पलको पे,

सनम चले आते हैं,
आप क्या जानो,

कहाँ से हमारे गम आते हैं,
आज भी उस मोड़ पर खड़े हैं,
जहाँ किसी ने कहा था,
कि ठहरो हम अभी आते हैं...

भुलाना भी चाहें भुला न सकेंगे
किसी और को दिल में ला न सकेंगे.....

भरोसा अगर वो न चाहें तो उन को
कभी प्यार का हम दिला न सकेंगे.......

वादा निभायेंगे, वो जानते हैं
कसम हम को झूठी खिला न सकेंगे......

क्यों आते नहीं वो है मालूम हम को
नज़र हम से अब वो मिला न सकेंगे......

ज़ोर-ए-नशा-ए-निगाह अब नहीं है
मय वो नज़र से पिला न सकेंगे............

हकीकत से अपनी वो वाकिफ़ हैं खुद ही
कर हम से अब वो गिला न सकेंगे........

कुछ बातें हम से सुना करो,
कुछ बातें हम से किया करो,

मुझे दिल की बात बता दो तुम,
होंठ ना अपने सिया करो,

जो बात लबों तक ना आए,
वो आंखों से कह दिया करो,

कुछ बातें कहना मुश्किल है,
तुम चहरे से पढ़ लिया करो,

जब तनहा-तनहा होते हो,
आवाज मुझे तुम दिया करो,

हर धड़कन मेरे नाम करो,
हर सांस मुझको दिया करो,

जो खुशियां तेरी चाहत हैं,
मेरे दामन से चुन लिया करो।

अधूरापन ख़तम हो जाता है,

तुम्हे पाकर....
दिल का हर तार गुनगुनाता है,

तुम्हे पाकर...

गम जाने किधर जाता है,

तुम्हे पाकर....

सब शिकवे दूर हो जाते है,

तुम्हे पाकर....

जानता हू चंद पलो का खेल है ये..
अफ़सोस नही रहता बाकी,

तुम्हे पाकर..

राह तकती, ये लम्बी पगड़ंड़िया ..
थक कर भी चैन पाती है आंखे,

तुम्हें पाकर..

तमाम मायुसिया छुप जाती है..
जिंदा लाश मानो उठ जाती है,

तुम्हे पाकर..

'तन्हा' मरना जीना सब भूल जाती है,
तुम्हारी बाहों में आकर..

बस तुम्हें पाकर.......

 

इन दियों को हवाओं में रखना
हमको अपनी दुआओं में रखना

वो जो वाली है दो जहानों का
उसको दिल की सदाओं में रखना

कोई तुम से वफ़ा करे न करे
नेक नीयत वफ़ाओं में रखना

हुस्न और इश्क़ उसकी नेमत हैं
तू हुनर इन अदाओं में रखना

हर तमन्ना गुलाब-सी महके
चाँद-तारों की छाओँ में रखना..

बड़ा बेचैन होता जा रहा हूं,
न जाने क्यूं नहीं लिख पा रहा हूं

तुम्हे ये भी लिखूं वो भी बताऊं,
मगर अल्फ़ाज़ ढूंढे जा रहा हूं

मोहब्बत का यही आ़गाज़ होगा,
जिधर देखूं तुम्ही को पा रहा हूं

कभी सूखी ज़मीं हस्ती थी मेरी,
ज़रा देखो मैं बरसा जा रहा हूं

किसी दिन इत्तेफ़ाकन ही मिलेंगे,
पुराने ख्वाब हैं दोहरा रहा हूं

मुझे आगोश में ले लो हवाओं,
गुलों से बोतलों में जा रहा हूं

शरारत का नया अंदाज़ होगा,
मैं शायद बेवजह घबरा रहा हूं

किसे परवाह है अब मंज़िलों की,
मोहब्बत के सफ़र पर जा रहा हूं

दिलों की नाज़ुकी समझे हैं कब वो,
दिमागों को मगर समझा रहा हूं

शब-ए-फ़ुरकत की बेबस हिचकियों से,
तसल्ली है कि मैं याद आ रहा हूं

मोहब्बत थी कहां हिस्से में ,
गज़ल से यूं ही दिल बहला रहा हूं..

है दिल में ख़वाईश की तुझसे इक मुलाक़ात तो हो,
मुलाक़ात ना हो तो फिर मिलने की कुछ बात तो करो,
मोती की तरह समेट लिया है जिन्हे दिल-ए-सागर मे,
ख़वाब सज़ा के, उन ख्वाबों को रुस्वा ना करो…

बहुत अरमान है की फिर से खिले कोई बहार यहाँ,
ये मालूम भी है की जा कर वक़्त आया है कहाँ,
हवा चलती है तो टूट जाते है ह्रे पत्ते भी तो कई,
तो सूखे फूलों से खिलने की तुम इलत्ज़ा ना करो…

ना ग़म करना तुम, ना उदास होना कभी जुदाई से,
वक़्त क्ट ही जाएगा तुम्हारा मेरी याद-ए-तन्हाई से,
ये दुनिया रूठ जाए हमसे तो भले ही रूठी रहे,
सच मर जाएँगे हम, तुम सनम रूठा ना करो…

लम्हा दर लम्हा बसे रहते हो मेरे ख़यालों मे,
ज़िक्र तुम्हारा ही होता है मेरे दिल के हर सवालों मे,
लो लग गयी ना हिचकियाँ तुम्हे अब तो कुछ समझो,
कह दो की  मेरे बारे मे इतना सोचा ना करो…

आँख खुलते ही ओझल हो जाते हो तुम,
ख्वाब बन के ऐसे क्यों सताते हो तुम…

गमों को भुलाने का एक सहारा ही सही,
मेरे मुरझाए हुए दिल को बहलाते हो तुम…

दूर तक बह जाते है जज़्बात तन्हा दिल के,
हसरतों के क़दमों से लिपट जाते हो तुम…

शीश महल की तरह लगते हो मुझको तो,
खंडहर हुई खव्हाईशोँ को बसाते हो तुम…

यादों की तरह क़ैद रहना मेरी आँखों मे,
आँसू बन कर पलकों पे चले आते हो तुम…

तुम्हारी अधूरी सी आस मे दिल ज़िँदा तो है
साँस लेने की मुझको वजह दे जाते हो तुम…

ख्वाबों और ख़्यालों का चमन सारा जल गया,
ज़िंदगी का नशा मेरा धुआ बन कर उड़ गया…
जाने कैसे जी रहे है, क्या तलाश रहे है हम,
आँसू पलकों पर मेरी ख़ुशियों से उलझ गया…

सौ सदियों के जैसे लंबी लगती है ये ग़म की रात,
कतरा कतरा मेरी ज़िंदगी का इस से आकर जुड़ गया…
मौत दस्तक दे मुझे तू, अब अपनी पनाह दे दे,
ख़तम कर ये सिलसिला, अब दर्द हद से बढ़ गया…

अगर रख सको तो एक निशानी हूँ मैं,
खो दो तो सिर्फ एक कहानी हूँ मैं ,
रोक पाए न जिसको ये सारी दुनिया,
वोह एक बूँद आँख का पानी हूँ मैं.....

हम तो हर बार मोहब्बत से सदा देते हैं
आप सुनते हैं और सुनके भुला देते हैं

ऐसे चुभते हैं तेरी याद के खंजर मुझको
भूल जाऊं जो कभी याद दिला देते हैं

ज़ख्म खाते हैं तेरी शोख नीगाही से बोहोत
खूबसूरत से कई ख्वाब सजा लेते हैं

तोड़ देते हैं हर एक मोड़ पे दील मेरा
आप क्या खूब वफाओं का सिला देते हैं

दोस्ती को कोई उन्वान तो देना होगा
रंग कुछ इस पे मोहब्बत का चढा देते हैं

तल्खी ऐ रंज ऐ मोहब्बत से परीशां होकर
मेरे आंसू तुझे हंसने की दुआ देते हैं

हाथ आता नही कुछ भी तो अंधेरों के सीवा
क्यूँ सरे शाम यूँ ही दील को जला लेते हैं

हम तो हर बार मोहब्बत का गुमा करते हैं
वो हर एक बार मोहब्बत से दगा देते हैं

दम भर को ठहरना मेरी फितरत न समझना
हम जो चलते हैं तो तूफ़ान उठा देते हैं

आपको अपनी मोहब्बत भी नही रास आती
हम तो नफरत को भी आंखों से लगा लेते

हैं.